तुम मुझे यूँ भुला ना पाओगे……..

हंशाह-ए-तरन्नुम -मोहम्मद रफी / पुण्य स्मरण : 31 जुलाई


(निशिकांत मंडलोई)

सुरों के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने बरसों पहले कहा था ‘ दुनिया में संगीत समझने वाले सच्चे संगीत प्रेमी अगर कहीं हैं तो वह सिर्फ हिंदुस्तान में। इसलिए जरूरी है कि हम सुनने वालों को ऐसा स्वस्थ और संगीतमय मनोरंजन प्रदान करें जिसे वे सदियों तक गाते और गुनगुनाते रहें। उनके इस दुनिया जहान से गए चार दशक बाद भी रफी साहब के ये शब्द संगीत के प्रति उनकी आस्था, आज आज पाश्चात्य संगीत के अंधेरे में भटकते सुरों की रागिनी को कितनी दूर तक रोशनी दिखा सकेगी यह कहना कठिन है लेकिन,यह सत्य है कि अगर रफी साहब आज जिंदा होते तो उनके ये शब्द आज उन पर भारी पड़ते। शायद उन्हें एक बार फिर से यह सोचना पड़ता कि जिस संगीत की वे बात कर रहे हैं उसके सुनने वाले पूरे हिंदुस्तान में नही बल्कि एक छोटे से वर्ग में सिमट कर रह गए हैं।
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चार दशक के पूर्व
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रमजान का मुबारक महीना चल रहा था। 31 जुलाई 1980 दिन जुमेरात, बांद्रा(बम्बई) के रफी विला में हिंदुस्तान के एक ऐसे नायाब हीरे चार दशक तक ध्रुव तारे की तरह चमकने वाले व फ़िल्म संगीत प्रेमियों के बीच मोहम्मद रफी के नाम से दुनिया में जाने जाने वाले को दिल का दौरा पड़ा और कुछ ही लम्हे में वह हम सभी संगीत प्रेमियों से हमेशा के लिए विदा हो गए।
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खूबियों का खजाना
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महबूबा के हुस्न की तारीफ, फिर उसकी याद में तड़पन, संसार में असीम दुःखों से निराश प्रभु की शरण में जाने वाला भक्त, वतन पर मर मिटने वाले जांबाज जवान के जज्बात, नाइट क्लब में जोशीले, मस्त ख्यालात या फिर सड़क पर भीख मांगने वाले भिखारी की दर्द भरी आवाज,,, इन सबको अपने गले से अहसास करा देना ही रफी साहब की खासियत थी। उनमें एक और अद्भुत बात थी जो आज किसी भी गायक में नहीं है, वह थी हर अभिनेता के स्वभाव से मेल खाती आवाज। उनकी गायकी का अंदाज और हाव भाव इतना प्रभावशाली था कि उस आवाज पर अदा करने वाले अभिनेता स्टूडियो में आकर उनके भावाभिनय देख कर मुग्ध हो जाते थे।
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आवाज का जादूगर
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रफी साहब फिल्मी दुनिया में आने के वक्त सहगल, तलत,पंकज मलिक व जीएम दुर्रानी का जमाना था लेकिन, उन सब के बीच रहकर भी नशीली, पुरकैफ,असरदार ओर दिलों की गहराइयों में उतर जाने वाली आवाज के मालिक रफी साहब ने गायकी के साथ ही इंसानियत और शराफत का जीता जागता मुकाम हासिल किया। उनकी एक और खासियत उन्हें अन्य गायकों से अलग रखती थी और वह थी कि सभी गायक गायन कला को जीवित रखने के लिए अपने गले की देखरेख विशेष रूप से करते हैं लेकिन उन्होंने अपने गले पर कभी कोई बंदिश नहीं लगाई।
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वालिद का मशविरा निभाया
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मोहम्मद रफी ने फिल्मी दुनिया में जब पहला कदम रखा तब उनके वालिद ने उन्हें एक नेक मशवरा दिया कि,,, बेटे आदमी कितना ही ऊंचा क्यों न उड़ ले फिर भी पैर जमीन पर ही रखना पड़ते हैं। आज तुम जिस सफर पर जा रहे हो खुदा तुम्हें कामयाब करे यही मेरी दुआ है। पर मेरी एक बात याद रखना,,, कभी घमंड नहीं करना, कभी किसी गरीब का दिल नहीं दुखाना। हो सके तो कोशिश करना बेसहारों का सहारा। बनने की। और ता उम्र रफी ने अपनी जिंदगी इसी मशवरे पर गुजारी।
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तुम महान गायक बनोगे
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फ़िल्म ,पहले आप, के निर्देशक कारदार मियां के पास एक बार सिफारिशी पत्र लेकर एक लड़का पहुंचा। तब उन्होंने नोशाद जी से खाकी भाई, इस लड़के के लिए कोई गुंजाइश निकल सकती है क्या। नोशाद ने सहज भाव से कहा ,,फिलहाल तो कोई गुंजाइश नहीं है। हाँ, अलबत्ता इतना जरूर है कि मैं इनको कोई समूह(कोरस) में गवा सकता हूं। लड़के ने हाँ कर दी। गीत के बोल थे,, हिन्दू हैं हम हिन्दुस्ता हमारा, हिन्दू मुस्लिम की आंख का तारा,,,। इसमें सभी समूह गायकों को लोहे के जूते पहनाए गए, क्योंकि गाते समय पैर पटक पटककर गाना था ताकि जूतों की आवाज का इफेक्ट आ सके। उस लड़के के जूते टाइट थे। गाने की समाप्ति पर लड़के ने जूते उतारे तो उसके पैरों में छाले पड़ गए थे। यह सब देख रहे नोशाद जी ने उस लड़के से कहा ,, जब जूते टाइट थे तो तुम्हें बता देना था,,। इस पर उस लड़के ने कहा,, आपने काम दिया यही मेरे लिए बड़ी बात है। तब नोशाद ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा था,,,एक दिन तुम महान गायक बनोगे,। यह लड़का आगे चलकर मोहम्मद रफी के नाम से जाना गया।
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काम को आराधना समझा
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मोहम्मद रफी ने जब बम्बई में प्रवेश किया तब वहां कई बड़े दिग्गजों की तूती बोलती थी लेकिन रफी ने किसी से कोई गर्ज न रखकर अपने काम को ही आराधना समझ स्वर लहरी के समुद्र में तन मन से जुट गए। धीरे धीरे संगीत के समुद्र से एक से एक मोती चुनकर लाए,,,,, सुहानी रात ढल चुकी, ना जाने तुम कब आओगे(दुलारी), मोहब्बत की राहों में चलना सम्हल कर(उड़न खटोला), दिल में छुपा के प्यार का तूफान ले चले(आन), इस दुनिया मे ए दिल वालों (दिल्लगी), इंसाफ का मंदिर है ये(अमर) और न जाने कितने गाने गाए और सफलतम चहेते गायक बनकर अपना एक विशेष स्थान बना लिया था।
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पद्मश्री से नवाजा
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रफी साहब ने अपनी जिंदगी में कभी किसी कलाकार को छोटा नहीं समझा। वे तो चाहते थे नए गायकों को भी अवसर मिले। रफी हर संगीतकार , गीतकार के साथ काम करने को तैयार रहते थे। उन्होंने काम को पूजा समझा और कभी भी किसी विवाद में नहीं रहे। उन्हें जब भी अवसर मिला उन्होंने फौजी भाइयों के बीच जाकर उनका भरपूर मनोरंजन कर हौसला अफजाई भी की। वर्ष 1960 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 1968 में ,, बाबुल की दुआएं लेती जा,,,(नीलकमल) गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक घोषित किया गया।
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आवाज एक अंदाज अनेक
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मोहम्मद रफी ने जिन फिल्मी कलाकारों के लिए गाने गाए उनमें एक कलाकार ऐसा भी है जो स्वयं भी एक मशहूर गायक रहा और वे हैं खंडवा वाले किशोर कुमार। इनके अलावा दादा मुनि अशोक कुमार, दिलीप कुमार, देवानंद, राजकपूर, सुनीलदत्त, प्रदीप कुमार, राजेन्द्र कुमार, महिपाल, गुरुदत्त, ब्रजभूषण, राजकुमार, शम्मीकपूर, विश्वजीत, जितेंद्र, मनोज कुमार, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, धर्मेंद्र, ऋषिकपूर, फिरोज खान, संजीव कुमार, शशिकपूर, नवीन निश्चल, जाय मुखर्जी, संजय खान, स्वरूप दत्त, जगदीप, जानी वाकर, महमूद, मनमोहन कृष्ण, प्रेमनाथ, ओम प्रकाश, प्रशांत, अजीत कुमार आदि के लिए स्वर प्रदान किया।
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अलविदा कह गए
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आज दूर दूर तक नजर दौड़ाने पर भी कोई दूसरा रफी दिखाई नहीं देता जिसके गले में वो मिठास, दर्द,आशिकी का तकाजा हो, देश प्रेम का जोश हो, कव्वाली की खनखनाहट हो, भक्त की पुकार हो,,,। उन्होंने कोई 26 हजार नगमे गाए। 31 जुलाई 1980 को संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के एक गीत की रिकार्डिंग के बाद ही …..ओके, नाऊ आई विल लिव…..कहकर सचमुच ही विदा हो गए लेकिन, कहीं न कहीं आज भी वे संगीतप्रेमियों के दिल पर राज कर रहे हैं। याद आ रहा है …….झुक गया आसमान….. का वह गीत जिसे रफी साहब ने गाया था, जिस्म को मौत आती है लेकिन रूह को मौत आती नहीं है…………………….।

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