आयुर्वेद दवाइयों से कैंसर के मरीजों को हो रहा लाभ

डॉ अखिलेश भार्गव, विभागाध्यक्ष शल्य तंत्र
शासकीय अष्टांग आयुर्वेद महाविद्यालय एवं चिकित्सालय इंदौर

कैंसर और अर्बुद को प्रारंभ से ही एक असाध्य चिकित्सकीय व्याधि माना गया है क्योंकि इस बीमारी से ग्रस्त होने के बाद रोगियों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति कमजोर हो जाती है बीमारी के तेजी से फैलने की वजह से रोगी की कम समय में ही मृत्यु हो जाती है और चिकित्सा के दौरान रेडियो थैरेपी ,कीमोथैरेपी एवं शल्य चिकित्सा होने से रोगी में अनेक उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं। इंदौर के शासकीय अष्टांग आयुर्वेद कॉलेज एवं चिकित्सालय में कैंसर के अनेक रोगियों का आयुर्वेदिक औषधियों एवं योगासन के द्वारा इलाज किया जाता है ,आयुर्वेदिक औषधियों के प्रभाव से रोगियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है एवं उनके लक्षणों में कमी आती है जिससे रोगी को सामान्य जीवन जीने में मदद मिलती है ।

क्या है कैंसर

कैंसर केवल एक बीमारी का नाम नहीं है, लगभग 100 से अधिक कैंसर के प्रकार मनुष्य में पाए जाते हैं ,वस्तुतः शरीर के किसी भाग में अंग में कोशिकाओं में जब किसी प्रकार से अनियंत्रित एवं असामान्य वृद्धि होने लगती है और यह कोशिकाएं संक्रमित होकर शरीर के अन्य भागों में तेजी से अपना प्रसार करती हैं ,इसलिए जब रोगी चिकित्सक के पास जाता है तो यह अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी होती है और इसका इलाज करना एक मुश्किल समस्या जैसा हो जाता है । जब से प्रकृति में बहुकोशिकीय प्राणी का जन्म हुआ तभी से कैंसर की उत्पत्ति हुई है, इसलिए यह मनुष्य की तरह जानवरों में भी पाया जाता है, कैंसर की उत्पत्ति के लेटिन शब्द cancrum से हुई है जिसका मतलब होता है crab l प्राचीन समय में आचार्य सुश्रुत के द्वारा हजारों वर्ष पूर्व ही केंसर अर्थात अर्बुद के कारण, लक्षण, प्रकार एवं चिकित्सा का वर्णन किया गया है ।आचार्य सुश्रुत ने सुश्रुत संहिता चिकित्सा स्थान के 18 वें अध्याय में अर्बुद की चिकित्सा का आयुर्वेदिक औषधियों द्वारा वर्णन किया है, आचार्य सुश्रुत ने औषधियों के अलावा इसकी शल्य चिकित्सा एवं इसके लिए अग्निकर्म का भी वर्णन किया है आचार्य सुश्रुत अग्निकर्म हेतु धातु की शलाका को तप्त गर्म करके अर्बुद की असामान्य कोशिकाओं को नष्ट करते थे ,क्योंकि अग्नि कर्मों के द्वारा जिन रोगों की चिकित्सा की जाती है वे रोग भविष्य में उत्पन्न नहीं होते हैं ऐसा आचार्यों का कथन है एवं प्रायोगिक रूप से ऐसा देखा गया भी है, सबसे पहले एक ग्रीक सर्जन लियोनिडा ने कैंसर की शल्य चिकित्सा के लिए चाकू का प्रयोग किया था परंतु भारतीय चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद में हजारों वर्ष पूर्व ही इस विधि का वर्णन प्राप्त होता है।
हमारे शरीर में प्रतिदिन सामान्य कोशिकाओं का विभाजन माइटोसिस एक नियमित प्रक्रिया है यह DNA पर आधारित जीन जिनके द्वारा नियंत्रित होती है ,यदि कैंसर के कारण जिन्हें हम कार्सिनोजेनिक कहते हैं उनके द्वारा हमारे शरीर की कोशिकाओं का DNA नष्ट होकर जीन में एक परिवर्तन उत्पन्न कर देते हैं और कोशिकाओं का सामान्य विभाजन अनियंत्रित हो जाता है और कोशिकाएं अनियंत्रित वृद्धि करके एक बड़ा मास बना लेती हैं जिन्हें नियोप्लाज्म अथवा मैलिग्नेंट ट्यूमर अथवा सामान्य भाषा में कैंसर कहते हैं ।
यह कोशिकाएं वृद्धि करके अपने समीपस्थ ऊत्तक, लसीका एवं रक्त कोशिकाओं के माध्यम से शरीर के अन्य भागों में फैलने लगती हैं, इस क्रिया को ही हम मेटास्टेसिस कहते हैं , धीरे-धीरे यह कोशिकाएं अपनी कॉलोनी बना लेती हैं और अपने पोषण के लिए अलग से ब्लड वेसल्स बना लेती है जिन्हें हम ट्यूमर एनजीओजेनेसिस कहते हैं ,इस प्रकार रोग का पता लगने तक विभिन्न प्रकार के कैंसर में विभिन्न प्रकार के म्यूटेशन हो चुके होते हैं और रोग का पता लगने के बाद एक्स-रे ,सीटी स्कैन ,पेट स्कैन, बोन स्कैन आदि जांचों से और अधिक म्यूटेशन होते हैं और कैंसर सेल अधिक तेजी से वृद्धि करती हैं, इसी दौरान कीमोथैरेपी ,रेडियो थैरेपी, हारमोनल थेरेपी आदि से भी कैंसर सेल्स की वृद्धि होती है और इससे कैंसर सेल में पुनः प्रादुर्भाव भी हो सकता है । यदि किसी बाह्य या अन्तःकारण से शरीर की कोशिकाओं का अनियंत्रित विभाजन शुरू हो जाता है इन्हीं कोशिकाओं को हम कैंसर सेल्स कहते हैं ।
शरीर की प्रत्येक कोशिका विभाजन करती है उसमें कैंसर होने की संभावना होती है, शरीर में अनेक प्रकार की कोशिकाएं होने से अनेक प्रकार के कैंसर भी होते हैं कोशिकाओं के प्रकार के आधार पर कैंसर के अलग-अलग नाम होते हैं जैसे कार्सिनोमा, सारकोमा ,मायलोमा, ल्यूकेमिया, लिंफोमा आदि।
शरीर के 80 परसेंट कैंसर जो एपिथेलियल सेल्स से उत्पन्न होते हैं उन्हें कार्सिनोमा कहते हैं ,जब शरीर में कहीं malignant ट्यूमर बन जाता है तो वहां की कुछ कोशिकाएं रक्त, लिम्फ आदि के द्वारा दूसरे स्थान पर जाकर अपनी वृद्धि करने लगती हैं इसे ही मेटास्टेसिस कहते हैं ।
आचार्य सुश्रुत ने बताया है कि शरीर में अपथ्य आहार-विहार के कारण विकृत हुए दोष वात-पित्त-कफ शरीर की धातुओं को दूषित, संक्रमित करके उत्तकों में गोल, स्थिर, अल्प पीड़ा वाला ,बड़ा ,धीरे धीरे बढ़ने वाला, मांस के उपचार से युक्त शोथ उत्पन्न कर देता है इस रोग को अर्बुद कहते हैं ,यह वात,से ,पित्त से ,कफ़ से ,मांस से, मेद से उत्पन्न होता है। सामान्यतः अभी तक इसका प्रधान कारण अज्ञात है परंतु अनुवांशिक रुप से ,अपथ्य आहार, केमिकल युक्त वायु एवं भोजन का सेवन, दूषित पानी का सेवन, धूम्रपान ,तंबाकू सेवन रेडिएशन का शरीर पर प्रभाव, वायरस का प्रभाव आदि को मुख्य कारण माना गया है ।

कैंसर के लक्षण

विभिन्न प्रकार के कैंसर में अलग अलग लक्षण पाए जाते हैं परंतु पेशाब में खून आना, खून की अचानक कमी होना,वजन का अचानक कम होना, एनीमिया ,मल में खून आना ,खांसी में खून आना ,स्तन में गांठ देखना या शरीर के किसी भाग में गठान देखना, शरीर पर असामान्य घाव हो जाना,महिलाओं में मीनोपॉज के बाद रक्त आना, प्रोस्टेट के लक्षण दिखाई देना आदि प्रमुख लक्षण हैं।

चिकित्सा

अगर किसी मरीज को कैंसर से संबंधित लक्षण दिखाई दे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, प्रारम्भिक अवस्था में यदि इलाज शुरू हो जाए तो इससे बचा जा सकता है, इसके लिए निम्न जांचे की जाना चाहिए1-खून की जांच करके रक्त में अनेक प्रकार की कैंसर कोशिकाओं का पता चल जाता है, एक्स-रे ,सीटी स्कैन, एमआरआई द्वारा ट्यूमर का पता लगाया जा सकता है, ट्यूमर का पता लगने पर कैंसर के प्रकार का पता लगाने के लिए उत्तक के कुछ भाग का टुकड़ा लेकर जांच के लिए भेजते हैं इसे बायोप्सी कहते हैं। कैंसर का पूर्ण पता लगने पर कीमोथैरेपी, शल्य चिकित्सा एवं रेडियोथैरेपी द्वारा इसका इलाज किया जाता है ।
किंतु कीमोथेरेपी के दौरान कुछ रोगियों की आंतों में घाव ,भूख नहीं लगना, बाल का उड़ना ,उल्टी जैसा मन होना ,कमजोरी ,कभी कब्ज का होना और कभी दस्त का लगना, नींद नहीं आना ,शरीर में दर्द का बढ़ना, मुंह में घाव होना ,मल मार्ग में घाव होना ,इस प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए आयुर्वेदिक औषधियों का प्रभाव अत्यंत लाभदायक है ऐसा प्रयोग रूप से एवं प्रत्यक्ष रुप से देखा गया है । रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आमलकी गुडूची का प्रयोग हल्दी का दूध के साथ प्रयोग अत्यंत लाभदायक है। गोमूत्र का प्रयोग कैंसर के लिए रामबाण दवा है। ठंडी चीजों का उपयोग कम से कम करना चाहिए ।अश्वगंधा नींद के आने और मानसिक शक्ति को बढ़ाने हेतु प्रभावी औषधि है ।रसायन के रूप में ब्रह्म रसायन का प्रयोग लाभदायक है ।मुलेठी चूर्ण को मधु के साथ लेने से आंतरिक घाव बभरने में सहायता मिलती है ।अनियंत्रित कोशिका विभाजन को रोकने हेतु प्राणायाम का अच्छा प्रभाव है योग चिकित्सा की सलाह से योग करना लाभदायक है ।मन के जीते जीत है मन के हारे हार अर्थात कैंसर के रोगी को हमेशा उत्साहवर्धक माहौल में रखना चाहिए रोगी हमेशा प्रसन्न रहना चाहिए। भूख नहीं लगने पर सोंठ, मरिच, पीपल, अजवाइन ,सौंफ का प्रयोग लाभदायक है। शरीर की अग्नि कम होने पर लीवर पर प्रयोग होने वाली दवाओं का प्रयोग यथा रोहितक, फलत्रिकादि क्वाथ। याददाश्त कम होने पर ब्राह्मी ,मण्डूक पर्णी का प्रयोग किया जा सकता है ।कब्ज बने रहने पर अरंड तेल लाभदायक है। उल्टी होने पर मयूरपिच्च भस्म का प्रयोग लाभदायक है ।यदि रोगी के शरीर के बाहरी भाग में घाव हो तो जात्यादि घृत के द्वारा प्रबंधन करना चाहिए ।कैंसर के रोगी की सत्व विजय चिकित्सा आवश्यक है अर्थात कई बार रोगी को ऐसे लोग जो कैंसर को जीत चुके हैं उनके बारे में बताना चाहिए। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के कोशिकाओं का अनियंत्रित विभाजन को रोकने में मदद मिलती है, धीरे-धीरे चिकित्सा विज्ञान में प्रगति होने पर कैंसर जैसी बीमारियों की रोकथाम में बहुत सहायता मिली है अब कैंसर से मरने वाले रोगियों में लगातार गिरावट आई है, कैंसर में काम आने वाली आयुर्वेदिक औषधियों पर रिसर्च हो चुकी है एवं लगातार हो रही है। वस्तुतः हम प्रतिदिन हमारे जीवन में कैंसर के कारणों का लगातार सेवन कर रहे हैं, जिन से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है परंतु हम अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर आने वाली बीमारियों की रोकथाम कर सकते हैं, हमें अपने जीवन में नियमित आहार विहार, सदवृत, दिनचर्या ,रात्रि चर्या, रितु चर्या का पालन ,प्राणायाम, योग, आसन का प्रयोग एवं आयुर्वेदिक संहिता में बताए गए नियमों का पालन करने पर अनेक प्रकार की बीमारियों से बचा जा सकता हैl
डॉ अखिलेश भार्गव, Mobile – 9039358305

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