संवाद अदायगी की बेजोड़ मिसाल मिनर्वा का शेर ; शोहराब मोदी

(निशिकांत मंडलोई)

हिन्दी सिनेमा को समृद्ध तथा गौरवशाली स्वरुप प्रदान करने में जिन गिने चुने लब्ध प्रतिष्ठित फिल्मकारों के योगदान को भुलाना सम्भव नहीं है उनमें एक नाम अभिनेता, फिल्मकार सोहराब मोदी का भी है। बात चाहे फिल्म निर्माण की हो, अभिनय की हो अथवा संवाद बोलने की शैली की, सोहराब मोदी का जवाब नहीं। उनकी संवाद अदायगी के कारण ही उन्हें मिनर्वा का शेर कहा जाता था। अपने पांच दशक के फिल्मी जीवन में कुल 38 फिल्मों का निर्माण, 27 फिल्मों का निर्देशन और 31 फिल्मों में अभिनय करने वाले सोहराब मोदी को भारतीय सिनेमा के हीरक इतिहास का साक्षी व फिल्मों के शुरुआती दौर का सशक्त प्रमाण माना जाता है।
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स्वाभाविक अभिनय को अमरता
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2 नवम्बर 1887 को पारसी घराने में जन्मे सोहराब मोदी मैट्रिक पास करने के बाद ही मैकेनिक प्रोजेक्सन सहायक के रूप में रंगमंच पर कार्य करने लगे। 1935 से 1945 तक जितने भी एतिहासिक चलचित्र बने उनमें सोहराब ने मूल चरित्र को अपने आप में इस प्रकार ढाला की दर्शकों को कभी यह महसूस नहीं होने दिया की वह सोहराब है या पात्र। ,सिकंदर, चलचित्र में पोरस तथा ,पुकार, में जहांगीर के रूप में उनके स्वाभाविक अभिनय को अमरता प्राप्त हुई। ,हेलमेट , चलचित्र के निर्देशक तथा अभिनय से फिल्मी करियर प्रारम्भ करने वाले सोहराब मोदी ने मिनर्वा मूवीटोन फिल्म कम्पनी की स्थापना की।
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मिनर्वा शेर की प्रमुख फिल्में
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पुकार 1939, भरोसा 1940, सिकंदर 1941, उल्टी गंगा 1942, भक्त रैदास, प्रार्थना, पृथ्वी वल्लभ 1943, परख 1944, एक दिन का सुल्तान 1945, शमा 1946, दीवानी 1947, मेरा मुन्ना 1948, दौलत, नृसिंह अवतार 1949, शीश महल 1950, झांसी की रानी 1953, मिर्जा गालिब, वारिश 1954, घर घर मे दिवाली, कुंदन 1955, राजहठ 1956, नौ शेरवान-ए-आदिल 1957, जेलर, यहूदी 1958, दो गुंडे, पहली रात 1959, घर की लाज, मेरा घर मेरे बच्चे 1960 आदि हैं। इनके अलावा उनकी अभिनीत भरत मिलाप 1965, समय बड़ा बलवान 1969, ज्वाला 1970, एक नारी एक ब्रह्मचारी 1971, रुस्तम 1982, रजिया सुल्तान 1983 भी प्रमुख फिल्में रहीं।
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सर्वश्रेष्ठ रही मिर्जा गालिब
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सोहराब मोदी द्वारा निर्मित फिल्म, मिर्जा गालिब, को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड तथा राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक तथा रजत पदक प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त उन्हें 1980 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
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पहली टेक्नीकलर फिल्म
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भारत की पहली टेक्नीकलर फिल्म ,झांसी की रानी, उन्होने बनाई थी। इसके लिए वे हालीवुड से तकनीशियन और साज सामान लाए थे लेकिन, फिल्म फ्लाप रही। कहते हैं इस फिल्म में सोहराब अपनी पत्नी मेहताब को लेकर भूल कर गए। फिल्म में मेहताब की अधेड़ अवस्था और लक्ष्मीबाई का गौरवपूर्ण यौवन मेल नहीं खाया। कहने का मतलब मेहताब लक्ष्मीबाई के एतिहासिक महत्व को उभार नहीं सकीं। इस विफलता से उबरने के लिए उन्होने ,मिर्जा गालिब,(सुरैया-भारत भूषण ) बनाई। उन्होने समाजिक समस्याओं पर भी फिल्में बनाई जिनमें शराबखोरी पर, ,मीठा जहर, तलाक की समस्या पर ,डाईवोर्स , फिल्म उल्लेखनीय हैं। उनकी सर्वाधिक चर्चित व सफल एतिहासिक फिल्म ,, पुकार,, थी। इसमें चन्द्र मोहन(जहांगीर), सायरा बानो की मां नसीम बानो(नूरजहाँ), सोहराब मोदी(संग्राम सिंह ) और सरदार अख्तर की भूमिकाएँ प्रमुख थीं। इस फिल्म को फिर से बनाने की उनकी बहुत तमन्ना थी लेकिन, वह पूरी नहीं हो सकी।
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बेहतरीन कृति ,,जेलर,,
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मिनर्वा मूवीटोन का “जेलर” सम्भवत: ऐसा पहला चलचित्र था जिसमें व्यक्ति के संघर्ष के सजीव और मार्मिक ढंग को प्रदर्शित किया गया था। इसमें एक कुरुप जेलर की कहानी थी जिससे कोई प्यार नहीं करता था। प्यार के अभाव में तड़पते इस जेलर के जीवन में एक अंधी लड़की आती है जो जेलर के मधुर स्वभाव व व्यवहार पर मुग्ध हो प्यार करने लगती है। जेलर अपने डाक्टर दोस्त से लड़की की आंखें ठीक करवाने की सोचता है। इसी के साथ वह डरता भी है कि कहीं आंखों कि ज्योति लौटने पर लड़की उसकी कुरुपता से घृणा न करने लगे। अन्त में वही हुआ जिसका जेलर को डर था। वह लड़की डाक्टर के साथ भाग जाती है। इस फिल्म में जेलर के रूप में सोहराब मोदी ने अपने अभिनय में पूर्ण सजीवता प्रदान की।
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उनकी आवाज के प्रति दीवानगी
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गम्भीर और सधी आवाज में डायलाग बोलना उनकी विशेषता थी। एक बार स्कूल के दिनों में अपने प्राचार्य से उन्होने पूछा था कि, मैं क्या बन सकता हूँ तब प्राचार्य ने कहा था- ” तुम्हारी आवाज सुनकर तो यही लगता है कि तुम्हे या तो नेता बनना चाहिए या अभिनेता”।
अपनी बुलंद आवाज के लिए पहचाने जाने वाले सोहराब मोदी की फिल्म का एक रोचक वाकया है। उनकी फिल्म “शीश महल” मिनर्वा सिनेमा में दिखाई जा रही थी उस समय मोदी भी थियेटर में मौजूद थे। उन्होने देखा की पहली पंक्ति में एक व्यक्ति आंखें बन्द किए बैठा है तो वे नाराज हुए । तत्काल एक कर्मचारी को कहा कि उस व्यक्ति को उसका पैसा लौटा कर उसे थियेटर से बाहर कर दो। कुछ देर बाद कर्मचारी ने लौट कर कहा, वह व्यक्ति अन्धा था और सिर्फ सोहराब मोदी की आवाज सुनने के लिए थियेटर में आया था।
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रह गई गुरु दक्षिणा
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सोहराब मोदी ने अपने 50 वर्ष के लम्बे फिल्मी जीवन में 50 से अधिक फिल्मों में काम किया। वे अन्तिम बार फिल्म ” रजिया सुल्तान” में दिखाई दिए । वे अपने जीवन की अन्तिम फिल्म “गुरु दक्षिणा” 1984 का मुहूर्त कर चुके थे लेकिन, फिल्म प्रारम्भ होने से पूर्व ही 28 जनवरी 1984 को उनका निधन हो गया।

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